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We are nonprofit team

Me Helping Hands multiply doesn't behold shall appear living heaven second roo lights. Itself hath thing for won't herb forth gathered good bear fowl kind give fly form winged for reason

Started 01-01-2014
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Website www.hardikgandhi.in
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Our Work

We're working for the homeless, hungry people

also providing a cloath and education to child.

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Education
Food
Cloath
Child development

Our Services

What we offer

Education for Child

Be tree their face won't appear day waters moved fourth in they're divide don't a you were man face god.

Support

support at all time, the main motto is support in critical condition.

Bright Future

Bright Future is not one in the same, as many people might think, so we have to introduce it to them.

28

Happiness

30

Cloths

12

Education

15

Days With Them

Our Portfolio

What WE do
  • All
  • Travel
  • Photograph
  • Foods

Our Work

Our Recent Working
jan 2014 - Dec 2016
Only One Man(Head)

From jan 2014 I(Hardik Gandhi) am working for all this type of Services... Name as "સ્વપ્ન ન જડે ત્યાં સુધી"

Jan 20117 - Jun 2017
Helping Hands

I try to find lots of contacts but not success as i think so I started Helping hands and serve my 10% of Income for It.

Jun 2017 - Present
Helping Hands Foundation (સ્વપ્ન ન જડે ત્યાં સુધી.)

Now I have 3 People's Group and work for same as always...

Our Blog

Latest blog
आज जब मैं भारत के 72वें स्वतंत्रता दिवस पर देश के शेल्टर होम्स में बच्चियों के लिए आज़ादी के मायने के बारे में सोचता हूं तो यही लगता है कि समाज में समानता के अभाव ने स्वतंत्रता के हर भाव को खोखला ही किया है।


शेल्टर होम्स की बच्चियों के लिए आज़ादी के मायने यही हो सकते हैं कि वह किसी तरह अंधेरे, सीलन भरे कमरे और रोज़-रोज़ की यातनाओं से मुक्ति पाकर, किसी तरह खुली हवा में सांस ले सके।
आज़ादी के मायने उन बच्चियों के लिए क्या होंगे, जो भूख से मर गईं, फिर चाहे वह दिल्ली की हो, झारखंड की या नावाडीह की। शायद उनके लिए आज़ादी उनकी भूख से मुक्ति का सपना हो। समय पर पेट भर खाना ही उनके लिए आज़ादी की नेमत हो।
अपने आस-पास खोजे तो इस तरह की कई कहानियां मिल जाएंगी, जिनके लिए आज़ादी के मायने आपको झकझोड़ने के लिए काफी है। मौजूदा सरकार की प्रसिद्ध योजना “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” के आलोक में ही बच्चियों के हालात को देखने की कोशिश करें तो बच्चियों के हालात बता देंगे कि बेटियों के लिए आज़ादी के मायने आज भी मूलभूत चीज़ों के लिए मयस्यर है। जो यह सिद्ध कर देते हैं कि लालकिले के प्राचीर पर मनाया गया स्वतंत्रता दिवस का उत्सव देश की राजनीतिक आज़ादी का उत्सव है, जिसमें उच्च वर्ग के साथ मध्य वर्ग भी शामिल है और देश की आबादी का बड़ा हिस्सा अपनी सामाजिक और आर्थिक आज़ादी के लिए टकटकी लगाए हुए है।
ज़ाहिर है कि देश में बच्चियों की बड़ी आबादी के लिए 15 अगस्त 1947 आया ही नहीं है। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने इन खतरों के प्रति आगह किया था कि यदि देश में आर्थिक-सामाजिक असमानता की खाई नहीं पाटी गई तो यह स्थिति राजनीतिक लोकतंत्र के लिए भी खतरा पैदा कर सकती है।
15 अगस्त 1949 को संविधान सभा में दिए अपने भाषण में उन्होंने कहा था,
राजनीति में हम एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत को मान रहे होंगे लेकिन सामाजिक और आर्थिक ढांचे की वजह से हम अपने-अपने सामाजिक-आर्थिक जीवन में हर व्यक्ति की एक कीमत नहीं मानते। अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता को हम कब तक नकारते रहेंगे?
उनकी यह आशंका सही सिद्ध हुई।
एक बड़ा तबका अभी भी सामाजिक और आर्थिक आज़ादी से महरूम है। यह वर्ग अपनी शादी में घोड़ी चढ़े और मंदिरों में बेरोकटोक जाए, इन सामाजिक आज़ादी तक से महरूम है।
एक सामान्य युवक यह तो चाहता है कि उसे प्रेम करने की आज़ादी मिले लेकिन यही काम जब उसकी बहन करती है तो जब-तब उसकी जान भी ले लेता है। भले ही रक्षा बंधन में उसे खुश रखने की दुहाई देता है। कुल मिलाकर हम जिस राजनीतिक परिवेश में रह रहे हैं, वहां सामाजिक-आर्थिक समानता के लोकप्रिय संदेशों को पढ़ रहे हैं, समझ रहे हैं पर खुद को या अपने परिवार को इस परिवेश में चिन्हित नहीं कर रहे हैं?
समझने की ज़रूरत यह है कि आज़ादी का मतलब यह है कि अपनी आज़ादी के साथ दूसरे की आज़ादी का भी सम्मान हो। इस दिशा में बढ़ना तो दूर, सोचना भी हमें गंवारा नहीं है। इस 72वें स्वतंत्रता दिवस पर यह कामना करना चाहिए कि हर कोई एक-दूसरे की आज़ादी का सम्मान करे। हमारी अाज़ादी तभी सार्थक हो सकती है जब समाज में समानता हो और लोकतंत्र हो। हमें अपने जीवन में आज़ादी के मायने उतारने होंगे, तभी हम सामाजिक-आर्थिक आज़ादी की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे।
Source:YKA

Urban Health Centres

Introduction
In Urban Health Centers present in every ward of Ahmedabad City, the following services are provided free of cost:
  • Family Planning Services
  • Services to Pregnant Ladies: registration, services related to delivery, DPT, Polio, BCG, Hepatitis B and Measels vaccination for children
  • Vitamin tablets to mother and child
  • Vitamin A to children for healthy vision
  • Treatment to children for diseases like fever, cough, diarrhea-vomiting, pneumonia
  • Conducting camps in slum areas for providing services for vaccination and general well-being of mother and child
  • Providing benefits of State Government schemes like Janani Suraksha Yojana, Bal Sakha Yojana, Kasturba Poshan Sahay Yojana, School Health Program etc. to intended beneficiaries

List of Zone-wise Urban Health Centers
Urban Health Centre Name & Address

Central Zone

Sr.No Ward Name Address
1 Khadiya Nr. Desai Ni Pole, Gujarati School.No.23, Khadia
2 Kalupur Sanjuba Hospital, 2nd Floor, Relief Road, Kalupur
3 Dariyapur Parvati Maternity Home, Dariyapur Jordan Road, Dariyapur
4 Shahpur Shahpur Chakla Maternity Home, Shahpur Chakla
5 Raikhad Nr. Raj Hospital. Opp Gaykwad Hospital, Raikhad
6 Jamalpur Jamalpur Dispensary, Jamalpur Panch Pipdi, Opp Police Choki
7 Dudeshwar Kirnnagar Maternity Home, B/H Lala Kaka Hall Dudheshwar
8 Madhupura Bardolpura Maternity Home ,Nr Lakhaji Kuvarji Hall
9 Girdharnagar Above City Civic Centr. Nr.Civil Hospital,Girdhar Nagar

West Zone

Sr.No Ward Name Address
1 Paldi Gujarat Sansodhan Mandal, Parekh Vas, Paladi
2 Vasna Nr.Vasna Cancer Hospital, Nr.Pravinnagar Vasna
3 Gandhigram Bhudarpura Road, Ambawadi
4 Navrangpura AIDS Control Society, Lal Bunglow
5 Stadium Karuna Turst Bulding, Usmanpura Cross Road
6 Naranpura Nr.Nanarnpura Master Station, Nr.Kameshwar Mahaved
7 Nava Wadaj Parth Tower, Punam Parti Plot, Nava Vadaj
8 Juna Wadaj Khadigram Udhyod, B/H Juna Wadaj Bus Stand
9 Sabarmati Ram Nagar Maternity Home , Pukharaj Hospital, Sabarmati
10 Chandkheda Chandkheda CHC, Opp Manikrupa Societym Chandkheda

South Zone

Sr.No Ward Name Address
1 Maninagar Mr. Utamnagar Gardan
2 Kankariya Kankariya Dispensary,Nr Parshi Agyarash, Kankariya
3 Baherampura Khodiyarnagar , Nr. B.R.T.S. Bus Stand
4 Danilimda Opp. Danilimda Police Station, Danilimda
5 Bage Firdosh At Mastar Station, Nr Baroda Express, Bage Firdosh
6 Vatva Vatav Maternity Home, Kashiba Ganral Hospital, Vatav
7 Ishanpur Nr Adarsh Tenament, Opp. Thakkar Deri, Govindwadi
8 Lambha Old Lambha Panchayat
9 Godashar At Pani Taki, Nr.Ramwadi Bus Stand, Godasardr

New West Zone

Sr.No Ward Name Address
1 Kali Nr.Kali PHC, Kali
2 Ranip Gayatri Mandir Road, Ranip
3 Chandlodiya PHC Chandlodiya, Nr. Badiyadev Mandir, Chandlodiya
4 Ghatlodiya Nr. Chankiya Puri Overbridge, Ghatlodiya
5 Thaltej Thaltej Samajvadi, Thaltej Gam
6 Bodakdev Memnagar PHC, B/H Manav Mandir
7 Jodhpur Opp.Kalini Society, Jodhpur Gam
8 Vejalpur PHC Vejalpur, Opp. Pani Tank, Vejalpur
9 Sarkhej PHC Sarkhej, Opp. Iti Sarkhej Gam
10 Ognaj PHC Ognaj. Ognaj

East Zone

Sr.No Ward Name Address
1 Bapunagar Viratnagar Road, Nr. Margha Farm, Bapunagar
2 Rakhiyal Rakhiyal Dispensary, Rakhiyal Cross Road
3 Gomtipur Gomtipur Referral Hospital, Gomtipur Darwaja, Gomtipur
4 Rajpur Rakhiyal Dispensary, Rakhiyal Cross Road
5 Amraiwadi UHC Center, Swastik Cross Road, Amraiwadi
6 Bhaipura AMTS Stand, Ekta Appartment, Ctm Road, Hatkeshwar
7 Nikol Nikol Road Master Station , Opp.Lilanagar Smasan Gruh
8 Odhav Juni Karshannagar Muni. Gujarati School, Rabari Vasahat
9 Khokhar Rukshmani Maternity Home, Khokhara Cross Road
10 Ramol PHC Ramol, Nr.Smasan Ramol Gam
11 Vastral Vastral Gam

North Zone

Sr.No Ward Name Address
1 Asarwa Asarwa Dispensary Na Makan Ma Haripura Gam Pase,Asarwa
2 Naroda Road New Comshiyal Mil Dispensary Arvind Mil Ni Baju Ma Naroda Road
3 Saraspur P.P.Yunit Sha.Chi.La. Hospital
4 Potaliya Chandraprashad Desai Hoal Ni Same Shreeji Shchool Ni Baju Mabapunagar
5 Kubernagar Kishansinh Tomar's House, Bhargav Road, B.J. Row-House,Kubernagar
6 Sardarnagar Sardarnagar Mastar Station, Opp-Police Station
7 Saijpur Nr.Rajiv Gandhi Bhavan, Nr.I.O.C.Petrol Pump
8 Thakkarnagar Thakkarnagar Master Station, Kevdaji's Chali, Thakkarnagar
9 Naroda Muthiya Maternity Home, Nr.Jain Derasar, Naroda Gam
10 Nava Naroda Nava Naroda Master Station, Nr.Ramapir Mandir, Nikol-Odhav Road,
11 Krishnanagar Nr.Saijpur Tower, Krushnagar Gram Panchayat's Home, Krushnagar
12 Nobalnagar Opp.Nobalnagar Police Station, B/H Ganpatibapa Mandir, Naroda Gam


जहां एक ऊंची जाति की महिला की औसत उम्र 54.1 साल है, वहीं एक दलित महिला की औसत उम्र सिर्फ 39.5 होती है। इसका कारण दलित महिलाओं को उचित साफ-सफाई न मिलना, पानी की कमी और समुचित स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है। 

सांकेतिक तस्वीर

 यूएन रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है कि दलित समुदाय से संबंध रखने वाली महिलाओं की औसत उम्र उच्च वर्ग की महिलाओं की तुलना में 14.6 साल कम होती है।इसका कारण दलित महिलाओं को उचित साफ-सफाई न मिलना, पानी की कमी और समुचित स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है। यूएन रिपोर्ट में 89 देशों को सम्मिलित किया गया है। 
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी रिपोर्ट में कई सारे खुलासे हुए हैं जिसमें भारत में महिलाओं की स्थिति चिंताजनक बताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक मातृत्व मृत्यु दर के पीछे कम साफ-सफाई, स्वास्थ्य की अच्छी सुविधा न होना जैसी कई वजहें होती हैं। इस रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है कि दलित समुदाय से संबंध रखने वाली महिलाओं की औसत उम्र उच्च वर्ग की महिलाओं की तुलना में 14.6 साल कम होती है। इस रिपोर्ट को 'टर्निंग प्रॉमिसेस इन टू एक्शन- जेंडर इक्वॉलिटी इन द 2030 एजेंडा' के नाम से प्रकाशित किया गया है।
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ दलित स्टडीज़ के 2013 के एक शोध के आधार पर इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां एक ऊंची जाति की महिला की औसत उम्र 54.1 साल है, वहीं एक दलित महिला की औसत उम्र सिर्फ 39.5 होती है। इसका कारण दलित महिलाओं को उचित साफ-सफाई न मिलना, पानी की कमी और समुचित स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है। यूएन रिपोर्ट में 89 देशों को सम्मिलित किया गया है। सभी 17 सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने और उन्हें लागू करने में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के सिए लैंगिक दृष्टि से अध्ययन कर रिपोर्ट को जारी किया गया है।
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि कैसे पूरे देश का विकास करने के लिए महिलाओं का विकास होना बेहद जरूरी है। इसमें सभी महिलाओं को सभी योजनाओं का लाभ दिलाने की भी बात कही गई है। रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि कैसे ग्रामीण परिवारों में लड़कियों की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में कर दी जाती है। साथ ही उनकी पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान नहीं दिया जाता। वहीं शहरी इलाकों की लड़कियों को इससे बेहतर सुविधाएं मिलती हैं और उन्हें पढ़ने का भी मौका दिया जाता है।
इंडियन

इंस्टिट्यूट ऑफ दलित स्टडीज के शोधकर्ताओं ने पाया कि ऊंची जाति और दलित महिलाओं की साफ-सफाई और पीने के पानी जैसी सामाजिक दशाएं एक जैसी भी हैं, तब भी सवर्ण महिलाओं की तुलना में दलित महिलाओं के जीवन प्रत्याशा में लगभग 11 साल का फर्क दिखाई देता है। भारत में अगर कोई महिला भूमिहीन है और अनुसूचित जाति से है तो उसके गरीब होने की संभावना ज्यादा हो जाती है. रिपोर्ट के शब्दों में ‘किसी महिला की कमजोर शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था में उसकी हैसियत तय करती है कि काम की जगह पर उसके लिए परिस्थितियां शोषणकारी होंगी या नहीं।
रिपोर्ट के मुताबिक असमानता की बढ़ती खाई के लिए आर्थिक स्थिति औरपरिवेश जैसे पहलू भी जिम्मेदार हैं। उदाहरण के लिए अगर किसी ग्रामीण परिवार में लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में कर दी जाती है तो वहीं शहरों में लड़कियों की शादी 20 से 24 साल में की जाती है। इससे शहरी परिवेश की महिला की तुलना में ग्रामीण महिला के कम उम्र में मां बनने, अपने पैसे का उपयोग न कर सकने या खर्च के बारे में जानकारी न होने की संभावनाएं भी कम ही रहती हैं। यूएन द्वारा दो साल पहले अपनाए गए सतत विकास के इस एजेंडा में 'लीव नो वन बिहाइंड' का नारा दिया गया है, जिसकी प्राथमिकता समाज के सर्वाधिक वंचितों की समस्याओं को उठाना है।
Source

सचमुच में महिलाओं/लड़कियों का सम्मान सिर्फ “बेटा और भाई” बनकर ही किया जा सकता है?
दरअसल, बात मेरे मन में वर्षों पूर्व, शायद 2003 से ही मेरे मन में आती रही है, जिस वक्त शायद मैं किशोरावस्था की दहलीज़ पर कदम रखने जा रहा था। जब कभी इसका उत्तर खोजने की कोशिश करता तो मेरे मन में एक अजीब बात आया करती थी कि क्या ये मेरा “यौनाकर्षण” है, फिर तो इसके बाद उस वक्त इस सवाल का जबाब खोजना इस समाज के अनुशासित मर्यादा को तोड़ने के जैसा था “जो मुझे आवारा बताने” को काफी था। खैर, आज भी कहा जाता है पर अब फर्क नहीं पड़ता।
फिर वक्त के साथ समय बदला, मैं बदला और बदला ये जहां और जो न बदला वो था मेरे किशोरावस्था से उपजा सवाल कि क्या सचमुच में महिलाओं/लड़कियों का सम्मान सिर्फ “बेटा और भाई” बनकर ही किया जा सकता है! वक्त के साथ बहुत कुछ बदला और बदल भी रहा है, पर बदल नहीं रहा मेरा वो सवाल। दशकों तक मेट्रो महानगरीय शहर में रहने के बाद भी मेरा सवाल वहीं गोते खा रहा है। शायद मैंने अपने सवाल को ना भूलने के बावजूद भी अपने मन के अलग कोठरी में बंद कर दिया था।

पर पिछले दिनों हुई कुछ घटनाओं ने फिर से इस ओर ध्यानाकर्षण किया, वैसे मैं हरसंभव कोशिशों से लगातार इस तरह के सवालों से जूझता रहा हूं, पर 21/04/2018 को मेरे एक “काबिल और होनहार” दोस्त के फोन कॉल के सवाल ने मुझे अचंभित तो नहीं पर चौंकाया ज़रूर कि समाज में नारी के सम्मान का पैमाना भी तय किया गया है, किया जा रहा है। उसका सवाल था, “तुम जो नारी सम्मान/अधिकार #RespectToWomen #WomenEmpowerment की बात करते हो तो क्या तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड नहीं थी और नहीं है।”
मैंने बड़ी सहजता से उत्तर दिया था कि बहुत सारे पहलू तुम जानते ही हो और ‘गर्लफ्रेंड नहीं है’ का जबाब है नहीं। फिर आगे उसने तपाक से बोला, तुम आगे कोई गर्लफ्रेंड नहीं बनाओगे। मैंने फिर सहज होकर बोला ऐसा तो मैंने नहीं बोला कि आगे क्या होगा, कैसी होगी, क्यों होगी? तो फिर कहता है अच्छा तो तुम अभी भी परहेज नहीं करोगे। मैंने कहा असंवैधानिक और अमर्यादित भी नहीं है तो परहेज़ कैसा ? खैर, तुम छोड़ों यार भविष्य की बात में क्यों पड़ते हो।
इन सभी बातों का मतलब झट से उसकी अगली बातों से समझ आ गया कि जब तुम “गर्लफ्रेंड” बनाने से परहेज़ नहीं रखते तो नारी सम्मान की बात क्यों करते हो? तब मुझे बड़ा अजीब लगा क्या ये मेरे “काबिल और होनहार” दोस्त की सोच है? तब मुझे लगा सचमुच में लाडले सिर्फ “माँ और बहन” को ही सम्मान का हकदार मानते हैं। साथ-साथ समाज अभी भी नारी सम्मान को रिश्ते से परिभाषित करने में लगे हैं।
बात को समाज से जोड़ने का भी मेरा सिर्फ एक कारण है कि हम हमेशा सुनते हैं, “पढ़ा-लिखा शहरी समाज” नारी और अन्य मुद्दे पर गांव-देहात से दो कदम आगे सोचता है। पर कुछ इस तरह परिभाषित करने का तर्क मेरे पास पढ़े-लिखे शहरी समाज के बीच से ही आया।
Via: Youth


मुगुदा के परिवार में 15 सदस्य रहते हैं। जिसमें उनका बेटा, बहु, पोते और उनके मां-बाप भी रहते हैं। वे एक किराए के घर में रहते हैं। अभी उनके घर की हालत कुछ खास अच्छी नहीं है, लेकिन फिर भी वह गरीबों की परवाह करते हुए उनकी जिंदगी सुधार रहे हैं। 

फोटो साभार- हिंदुस्तान टाइम्स

जमीन पाने वाली एक विधवा राजेश्वरी ने कहा कि मुगुदा किसी भगवान से कम नहीं हैं। उन्होंने कहा, 'मेरे पास एक भी इंच जमीन नहीं थी, लेकिन अब मेरे पास खुद की जमीन हो गई है।'
उड़ीसा के एक छोटे से कस्बे जेपुर में रहने वाले मुगुदा सूर्यनारायण आचार्य ने वो किया है जिसे करने की हिम्मत सबके भीतर नहीं होती है। उन्होंने गांव में 250 भूमिहीन लोगों में अपनी 2.3 एकड़ जमीन दान कर दी है। 1997 में मुगुदा ने गांव में एक शिव मंदिर बनवाने की इच्छा जताई थी। उस वक्त उनके पास अच्छे पैसे भी थे। लेकिन गांव के एक पुजारी ने उनसे कहा कि अगर वे मंदिर बनवाने की बजाय अपनी जमीन गरीबों में बांट दें तो उन्हें भगवान का आशीर्वाद और गरीबों की दुआएं भी मिलेंगी। इस सलाह को मानते हुए मुगुदा ने अपना वादा निभाया और अपनी जमीन दान कर दीय़

मुगुदा के परिवार में 15 सदस्य रहते हैं। जिसमें उनका बेटा, बहु, पोते और उनके मां-बाप भी रहते हैं। वे एक किराए के घर में रहते हैं। अभी उनके घर की हालत कुछ खास अच्छी नहीं है, लेकिन फिर भी वह गरीबों की परवाह करते हुए उनकी जिंदगी सुधार रहे हैं। पिछले माह जनवरी में उन्होंने 10 लोगों को जमीन के कागजात देते हुए इस कार्य को पूरा किया। वह खिड़की फैब्रिकेशन की वर्कशॉप चलाते हैं। उनकी वर्कशॉप भी किराए के मकान में चलती है। उनके घर और वर्कशॉप का किराया 15,000 रुपये है।
उन्होंने इस मौके पर हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए कहा, 'आज मैं बेहद खुश हूं क्योंकि मैंने 20 साल पहले किया गया अपना वादा निभाया है। मेरे पास भले ही खुद का घर नहीं है, लेकिन कई सारे भूमिहीनों को जमीन दान करने के बाद मैं खुशी से मर सकूंगा।' हर एक भूमिहीन को मुगदा की तरफ से 360 स्क्वॉयर फीट जमीन दान में मिली। मुगुदा के बचपन के दस्त सुधीर सारंगी ने इस पर कहा कि कई सारे रियल एस्टेट ब्रोकर ने मुगदा को इस जमीन के लिए 3-4 करोड़ रुपये ऑफर किए, लेकिन उन्होंने ये ऑफर ठुकरा दिया। वो ऐसे इंसान हैं जो नेकी करने के बाद श्रेय भी नहीं लेना चाहते।
जमीन पाने वाली एक विधवा राजेश्वरी ने कहा कि मुगुदा किसी भगवान से कम नहीं हैं। उन्होंने कहा, 'मेरे पास एक भी इंच जमीन नहीं थी, लेकिन अब मेरे पास खुद की जमीन हो गई है।' मुगुदा ने कहा कि यह जमीन इन गरीबों की किस्मत में लिखी थी इसलिए उन्हें ये मिली। जमीन पाने वालों में से विधवाओं के साथ ही गरीब मजदूर भी हैं। इन लोगों ने कहा कि वे अंतिम सांस तक उनका अहसान नहीं भूलेंगे। मुगदा ने कहा कि वह बचपन से ही महाभारत, रामायण और पुराणों की कहानियां सुनते हुए बड़े हुए हैं। उन्होंने इसका श्रेय भगवान को देते हुए कहा कि ऊपर वाला जो चाहता है हमसे वही कराता है इसमें उनका कुछ योगदान नहीं है। (तस्वीर और स्टोरी साभार- हिंदुस्तान टाइम्स)

दोस्तों से फंड जुटाकर अमिताभ ने फरवरी 2015 में भोपाल, मध्य प्रदेश से 25 किलोमीटर दूर एक आदिवासी गांव केकड़िया में अपना काम शुरू किया। उन्होंने उसी महीने अपना एनजीओ अभेद्य शुरू कर दिया। 

अमिताभ सोनी
जहां एक तरफ बेहतर नौकरियों की खोज के लिए गांवों से शहरी इलाकों की तरफ पलायन एक बढ़ता हुआ ट्रेंड था। तो वहीं अमिताभ के लिए गांव के स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करने की प्रेरणा थी।
जीवन क्या है? वही जो दूसरों के काम आए! लेकिन मौजूदा समाज में ऐसे बहुत कम उदाहरण मिलते हैं। दूसरों की मदद करने के लिए अपनी जिंदगी को समर्पित करना कोई आसान बात नहीं, लेकिन यह स्वाभाविक रूप से अमिताभ सोनी के लिए आसान सी लगती है। अमिताभ सोनी ने लंदन में एक दशक से अधिक समय तक समाज कल्याण विभाग के लिए काम करते हुए बिताया। वह जुलाई 2014 में भारत लौट आए और 'अभेद्य' शुरू किया।
इंटरनेशनल बिजनेस में मास्टर की डिग्री करने वाले अमिताभ कहते हैं "यूके में काम करने का विचार लोकतंत्र के बारे में सीखना था- कैसे सिस्टम काम करता है, विभाग कैसे काम करता है और कैसे सरकार और लोग अपने प्रयासों को सिंक्रनाइज करते हैं। मैं हमेशा वापस आना चाहता था और हमारे देश के लिए कुछ करना चाहता था, लेकिन क्योंकि मुझे बहुत कुछ सीखना था इसलिए मुझे वापस भारत आने में काफी समय लगा।"
दोस्तों से फंड जुटाकर अमिताभ ने फरवरी 2015 में भोपाल, मध्य प्रदेश से 25 किलोमीटर दूर एक आदिवासी गांव केकड़िया में अपना काम शुरू किया। उन्होंने उसी महीने अपना एनजीओ अभेद्य शुरू कर दिया। जिसने अपनी विंग केकड़िया और तीन अन्य आसपास के गांवों के तक फैला लीं। संगठन ने शिक्षकों और आदिवासी युवाओं के साथ मिलकर काम किया और चार क्षेत्रों - शिक्षा, रोजगार और आजीविका, जल प्रबंधन और शासन में सुधार पर ध्यान दिया।

विलेज क्वेस्ट - एक जनजातीय आईटी पहल

जहां एक तरफ बेहतर नौकरियों की खोज के लिए गांवों से शहरी इलाकों की तरफ पलायन एक बढ़ता हुआ ट्रेंड था। तो वहीं अमिताभ के लिए गांव के स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करने की प्रेरणा थी। एक साल पहले टीम अभेद्य ने 'विलेज क्वेस्ट' की शुरुआत की ये गांव के युवाओं के स्वामित्व वाली एक आईटी पहल थी। इसके संचालन की देखरेख करने वाले पांच निदेशकों की एक टीम भी थी।
इस टीम ने सेकेंड हैंड कंप्यूटरों को खरीदने के साथ-साथ फर्नीचर में थोड़ा निवेश एक साधारण कार्यालय को पेशेवर आईटी कार्यालय जैसा बना दिया। अमिताभ कहते हैं कि "ये युवा लोग खेती करने वाले समुदाय से आते हैं और वे कामकाज के आदी हैं। इसलिए कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठना उनके लिए किसी केक-वॉक की तरह था। इन लोगों के बारे में एक खास बात ये भी है कि एक बार जब आप उन्हें उद्देश्य की भावना दे देते हैं और उन्हें अंतिम लक्ष्य समझाते हैं, तो वे बहुत ही केंद्रित हो जाते हैं और लक्ष्य को पाने की दिशा में काम करना शुरू कर देते हैं।"
कंप्यूटर सेंटर
युवाओं में ज्यादातर स्नातक हैं। आईटी के क्षेत्र में ज्यादा जानकारी तो नहीं है लेकिन एमएस ऑफिस चला लेते हैं। अधिकांश ने केवल कॉलेज में कंप्यूटर का इस्तेमाल किया है। इन युवाओं को उन वोलेंटियर्स ने डेटा एंट्री की ट्रेनिंग दी जो खुद भोपाल के इंजीनियरिंग छात्र या स्नातक हैं। तीन दिल्ली में वेब प्रौद्योगिकियों और कोडिंग की ट्रेनिंग भी कर रहे हैं।
कोई उचित मार्केटिंग टीम के साथ न होने के चलते अभेद्य ने उन आईटी कंपनियों से संपर्क किया जो उनके दोस्तों और परिचितों की थीं। विलेज क्वेस्ट गांव में होने के कारण 16 सदस्यों की टीम ही काम कर सकी। इनका ये ऑफिस गैर-आदिवासियों के लिए भी खुला रहता है। डेटा एंट्री आईटी क्षेत्र में एक छोटा कदम था लेकिन सबसे बड़ी चुनौती अब बिजली आपूर्ति थी क्योंकि बिजली कटौती अक्सर और बिना निर्धारित समय पर होती है। इस पर काबू पाने के लिए अभेद्य टीम ने क्राउड फंडिंग कैंपेन शुरू कर दिया। इस धन का प्रयोग सौर पैनलों को स्थापित करने के लिए किया गया ताकि ग्रामीण लोग अपने उद्देश्यों के लिए काम कर सकें।

अभेद्य के तहत प्रोजेक्ट्स

अभेद्य टीम गांव में स्थानीय स्कूल के साथ काम कर रही है ताकि डेस्क और बेंच, शौचालय, दोपहर के भोजन और बिजली कनेक्शन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। उन्होंने गांव के बेहतर लाभ के लिए पंचायत के माध्यम से नेविगेट करने के लिए युवाओं को प्रशिक्षित करना शुरू किया। संगठन (अभेद्य) के हस्तक्षेप के बाद से साक्षर युवाओं ने पंचायत के शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग के सेक्शन में हिस्सा लिया है।
अमिताभ कहते हैं कि "अठारह बच्चों (17 लड़कियों और 1 लड़के) को अठारह परिवारों द्वारा एक निजी स्कूल में जाने के लिए स्पोन्सर किया गया है। छात्रों में से एक को भोपाल के नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट ऑफ यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिला है, जबकि दूसरा एक दिल्ली में श्रीजान नामक आईटी कंपनी में पेड इंटर्नशिप कर रहा है। गुरुकुल नामक संस्थान में दिल्ली में दो सॉफ्टवेयर प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। ये अद्भुत जीत है उनकी जो हमारे प्रयासों का समर्थन करते हैं और हमें और अधिक करने के लिए प्रेरित करते हैं।"
गांव में आईटी लैब्स बच्चों को कंप्यूटर की बुनियादी चीजों जैसे कि टाइपिंग, एमएस सॉफ्टवेयर और एमएस पेंट पर शिक्षित करने में भी काम करती है, और लगभग 200 लोग क्लास अटेंड करते हैं। सिंचाई के लिए पानी की कमी का सामना करने वाले गांव के साथ अभेद्य अब छोटे-छोटे चेक डैम, स्टॉप डैम, और झीलों की एक श्रृंखला बनाने की योजना बना रहा है।
बच्चे हर समाज के निर्दोष भविष्य हैं। दुनिया भर के देशों ने अपने पूर्व-प्रतिष्ठित अधिकारों का पालन-पोषण किया और खुश रहना है। और फिर भी, हमारे 70 वर्षीय भारत में, एक समूह - बौद्धिक और विकासात्मक चुनौतियों वाले बच्चों (सीडब्ल्यूसी) - उनकी जरूरतों को अनियंत्रित और उनके भविष्य की अनिश्चितता मिलती है।बौद्धिक और विकासात्मक चुनौतियों में आत्मकेंद्रित, सेरेब्रल पाल्सी, डाउन सिंड्रोम और बौद्धिक विकलांगता जैसे परिस्थितियां शामिल हैं। इन चुनौतियों के साथ बच्चों पर शोध की कमी ने उन्हें नीति और शिक्षा के मार्जिन पर छोड़ दिया है। भारत में सीडब्ल्यूसी की संख्या गंभीर रूप से गिनती की जाती है, जिससे जनसंख्या समूह के रूप में भी उनकी कमियों को कम कर दिया गया है।ऐसी परिस्थितियों वाले बच्चों के रहने वाले अनुभवों पर चर्चा करते हुए कुछ अध्ययन उपलब्ध हैं। सीडब्ल्यूसी और उनके माता-पिता और दिल्ली में विशेष सेवाओं तक पहुंचने वाले देखभालकर्ताओं द्वारा सामना किए जाने वाले सामाजिक और सेवा अवरोधों पर अनुभवजन्य प्रमाण की आवश्यकता के लिए, भारत के अमृत फाउंडेशन ने पाटांग परियोजना पर अमाल्टस के साथ सहयोग किया। सीवीसी के लिए सेवाओं और अवसरों के इनकार करने के हद तक साक्ष्य एकत्र हुए हैं। यह हमें समझने में भी सहायता करता है कि किस प्रकार को बदलने की जरूरत है और सीडब्ल्यूसी के लिए खेल मैदान को कैसे स्तरित करना है।पतंग प्रोजेक्ट ने पाया कि दिल्ली में, सीडब्ल्यूसी के 75% सर्वेक्षण ने सेवाओं का लाभ उठाने के लिए सरकारी संस्थानों को दिया। इस प्रकार सरकार की जिम्मेदारी पहुंच योग्य और गुणवत्ता वाली सेवाएं सुनिश्चित करने के लिए है। हालांकि, क्षेत्र में सेवा प्रदाताओं ने तर्क दिया कि सरकार सीडब्ल्यूसी को अच्छी गुणवत्ता वाली सेवाएं प्रदान करने के लिए पर्याप्त नहीं कर रही है। यह आरोप सबूतों से पुष्टि करता है, जिसमें निजी सूचक सेवा और गैर-सरकारी संगठनों की तुलना में सरकारी संस्थानों के लिए सेवा सूचकांक गुणवत्ता की गुणवत्ता को मापने में बहुत कम है। सीडब्ल्यूसी की विशेष जरूरतों से उत्पन्न वित्तीय बोझ अपने माता-पिता और देखभाल करने वालों के लिए बेहतर गुणवत्ता सेवाओं पर स्विच करना मुश्किल बनाता है परियोजना के लिए लगभग 70% उत्तरदाताओं ने सेवाओं तक पहुंचने के लिए एक महत्वपूर्ण बाधा के रूप में वित्त का हवाला दिया।
">सीडब्ल्यूसी के 99% माता-पिता और देखभालकर्ता अपनी निजी बचत और कमाई सेवाओं पर भरोसा करते हैं, जिससे उनकी ज़िंदगी अनिश्चित होती है और सेवाओं की संख्या कम हो जाती है, कम हो जाती है।चुनौतियों से निपटने के लिए देखभाल करने वालों के जीवन के लिए ठोस परिणाम हैं एक वित्तीय लागत है - सेवाओं और परिवहन के लिए भुगतान; एक सामाजिक लागत - कलंक और भेदभाव का अनुभव; और भावनात्मक लागत - निराशा की भावना। इन लागतों के मिश्रण में सीडब्ल्यूसी और उनके देखभाल करने वालों के साथ समाज के साथ बातचीत होती है। न केवल सीडब्ल्यूसी और देखभालकर्ताओं को वित्तीय बोझ से खारिज कर दिया जाता है, लेकिन खुद को सक्षम शरीर वाले लोगों के पक्ष में रखने के लिए तैयार एक असाधारण वातावरण में मिलना सीडब्ल्यूसी और देखभाल करने वाले पृथक महसूस करते हैं कलंक और भेदभाव बच्चों की स्थिति को छिपाने के लिए देखभालकर्ताओं का नेतृत्व करता है और यथासंभव लंबे समय तक इनकार में रहता है। यह अस्वीकृति सीडब्ल्यूसी पर एक हानिकारक प्रभाव पड़ता है क्योंकि वे शुरुआती समय में हस्तक्षेप से लाभ नहीं पा सकते हैं।अध्ययन में पाया गया कि ज्ञान शून्य में, माता-पिता और देखभाल करने वालों को पता नहीं है कि किसकी तलाश है, या किससे संपर्क करना है ज्यादातर माता-पिता और देखभाल करने वालों को उनके कार्य के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए शब्द-मुंह पर भरोसा करना पड़ता है। जब सेवाओं की मांग की जाती है, तो वे अभी तक उपलब्ध नहीं हैं या अनुपयोगी हैं जो खराब उपयोग के लिए हैं। गरीबों के लिए और विशेष रूप से गंभीर चुनौतियों वाले लोगों के लिए यह बहुत बुरा है न केवल देखभाल करने वालों को उनके कार्यस्थल पर संकट का सामना करना पड़ता है, उनके पास सभी का समर्थन नहीं है बल्कि सबसे तत्काल परिवार का समर्थन है। पड़ोस, हालांकि पूरी तरह से विघटनकारी नहीं है, शायद ही कभी सहायक है और सीडब्ल्यूसी से बचने के लिए पसंद करता हैसीडब्ल्यूसी के लिए जगह बनाने के हमारे समाज की अक्षमता ने सीडब्ल्यूसी के अपने वातावरण में सीखने और भाग लेने के अवसरों को कम किया है। पतंग परियोजना में पाया गया कि 6 से 18 साल के बीच 10 सीडब्ल्यूसी में से चार स्कूल स्कूल से बाहर हैं। एंटाइटेलमेंट के बारे में आसानी से उपलब्ध जानकारी का अभाव का मतलब है कि 50% से अधिक बच्चों को मूल्यांकन की आवश्यकता होती है, जिन्होंने मनोवैज्ञानिक नहीं देखा है और चुनौतियों वाले 60% से अधिक लोगों को विकलांगता प्रमाण पत्र नहीं है। यह बेहतर परिणाम के लिए एक महत्वपूर्ण बाधा है, चूंकि विकलांगता प्रमाणपत्र कई एंटाइटलमेंट और सेवाओं का प्रवेश द्वार है।सीडब्ल्यूसी की चुनौतियों से भरा दुनिया का सामना करना पड़ता है और फिर भी यदि सीडब्ल्यूसी अन्य बच्चों के समान समर्थन का स्तर प्राप्त कर सकता है, तो परिणाम असाधारण हो सकते हैं। कई उदाहरण हैं जो दिखाते हैं कि यदि सीडब्ल्यूसी को उनकी देखभाल की ज़रूरत होती है, तो वे नौकरियां पकड़ सकते हैं, व्यवसाय चला सकते हैं और समाज के उत्पादक सदस्य बन सकते हैं। पतंग परियोजना सीडब्लूसी के लिए अवसरों से भरी दुनिया में चुनौतियों से भरा विश्व को सुनिश्चित करने की दिशा में एक कदम है। ऐसा होने के लिए, हमें अभ्यास से उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधानों और यहां तक ​​कि मोरेसो द्वारा अच्छी नीतियों की आवश्यकता होती है।हम यह सुनिश्चित करने के लिए कि सरकारें विधायी और नीतिगत परिवर्तनों के आधार पर कार्रवाई कर रही हैं, हमारे सांसदों, नीति-निर्धारकों, सरकारी सेवाओं, नागरिक समाज और सेवा प्रदाताओं पर गौर करें। व्यापक जागरूकता से सामना किए गए मुद्दों के लिए सार्वजनिक समर्थन के मैदान को प्रोत्साहित कर सकते हैं

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